आखिर चीन के उपाय भारत-नेपाल भू-सांस्कृतिक और एथनिक कनेक्ट को क्यों नहीं तोड़ पाए?

दरअसल बाजारवादी पूंजीवाद के इस दौर को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्राय: ऐसी अवधारणाएं गढ़ी जाती हैं जो कुछ समय के लिए ही सही पर पूंजी और बाजार की सर्वोच्चता जैसी विशेषता को स्थापित कर जाती हैं। दरअसल गरीब देश जल्द अमीर बनने की महत्वाकांक्षाओं से संपन्न होते हैं या फिर वे अपनी जनता को झूठा सपना दिखाकर सत्ता में आए होते हैं

आठ वर्ष बीतने के बाद अब यह समीक्षा का विषय है कि नेपाल के साथ-साथ स्थापित भू-सांस्कृतिक एकता आधारित संवेदनशील रिश्तों में कितना मूल्यवर्धन हुआ या कितना क्षय हुआ

पहला- वित्तीय पूंजीवाद के इस बाजारवादी समय में क्या पूंजी या बाजार भू-संस्कृति पर आधारित संबंधों की ऐतिहासिक कड़ी तोड़ने में समर्थ हैं? दूसरा- क्या छद्म भाषावाद और ऋणवाद जिसे प्रतीकात्मक तौर पर मंडारिन-रेनमिनबी